सर्व सिद्धि के लिए नरसिंह भगवान पूजा विधि- Narsingh Bhagwan

Narsingh Bhagwan Puja: ॐ सोममण्डलाय षोडषकलात्मने देवार्ष्यामृताय नमः (यह अर्घ्य मन्त्र है) ॐ आत्मतत्वात्मने नमः, ॐ विद्यातत्त्वात्मने नमः ॐ शिवतत्वात्मने नमः
निम्नलिखित मंत्रों द्वारा अपने साथ ही मण्डल का भी विधिवत प्रोक्षण करें। फिर अक्षत फूलों सहित गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए।

Narsingh Bhagwan

दशावतार प्रणाम करें – ॐ विष्णवे नमः । ॐ कूर्माय नमः ॐ वाराहाय नमः ॐ नृसिंहाय नमः । ॐ वामनाय नमः। ॐ परशुराम नमः। ॐ रामाय नमः । ॐ कृष्णाय नमः ॐ बुद्धाय नमः। ॐ कलिकाय नमः।  फिर गायत्री मंत्र का उच्चारण करें: ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्ण प्रचोदयात्॥

किसी भी कार्य को सही ढंग से समप्न्न करने के लिए हमे भगवान की पूजा विधिवत तरीके से करनी चाहिए | आज इस लेख में हम आपको Bhagwan Narsingh Puja Vidhi बताने जा रहे है |

॥पाद्य॥

यद्भक्तिलेशसम्पर्कात् परमानन्दसम्भवः। तस्मै ते चरमाव्जाय पाद्यं शुद्धाय कल्पयते॥ भावार्थ-जिनकी थोड़ी सी ही भक्ति से परमानन्द का समुद्र उमड़ आता है। आपके उन चरण कमलों के लिए पाद्य प्रस्तुत कर रहे हैं।
॥अर्घ्य॥

तापत्रयहरं दिव्यं परमानन्दल क्षणम्? तापत्रयविनिर्मकत्यै तवाऱ्या कल्पयाम्यहम्॥ भावार्थ-प्रभु मैं तीन प्रकार के तापों से छुटकारा पाने के लिए आपकी सेवा में त्रितापहारी परमानन्द स्वरूप दिव्य अर्घ्य अर्पण करता है।
॥आचमनीय॥(Narsingh Puja)

वेदानामपि वेदाय देवानां देवतात्मने। आचामं कल्पयामीश शुद्धानां शुद्धिहेतवे॥ भावार्थ-भगवन आप वेदों के भी वेद और देवताओं के भी देव हैं। शुद्ध पुरुषों की भी परम शुद्धि हेतु हैं। आपके लिए आचमनीय प्रस्तुत करता हूँ।।

॥मधुपर्क॥

सर्वकालुष्यहीनाय परिपूर्ण सुखात्मने। मधुपर्कमिदं देव कल्पयामि प्रशीद मे॥ भावार्थ-भगवन् आप सम्पूर्ण कलुष रहित हैं तथा परिपूर्ण सुख स्वरूप हैं। मैं आपके लिए मधुपर्क अर्पण करता हूँ।

॥पुनराचमनीय॥

उच्छिटटोडप्यशुचिर्वापि यस्य स्मरणमात्रतः। शुद्धिमाप्नोति तस्मै ते पुनराचमनीयकम्॥ भावार्थ-भगवन् आपके स्मरण मात्र से जूठा या अपवित्र मनुष्य भी शुद्धि प्राप्त कर लेता है। उन्हीं आप परमेश्वर के लिए पुन: आचमनार्थ (जल) उपस्थित करता हूँ।

॥स्नेह तैल॥

स्नेहं गृहाण स्नेहेन लोकनाथ महाशय। सर्वलोकेषु शुद्धात्मन् ददामि स्नेहमुत्तमम्॥ भावार्थ-भगवन् आपका अन्तः करण विशाल है। सम्पूर्ण लोकों में आप ही शुद्ध बुद्ध आत्मा है। मैं आपको यह उत्तम स्नेह (तैल) अर्पण करता हूँ। आप इस तेल को ग्रहण कीजिये।

॥स्नान॥

वोधाब्धिनिमग्रनिजमूर्तये। परमानन्द साङ्गेपाङ्गमिदं स्नानं कल्पयाम्यहमीश ते॥ भावार्थ-भगवन् आपका निज स्वरूप तो निरन्तर परमानन्दमय ज्ञान के अगाध महासागर में निमग्न रहता है। (आपको ब्राह्म स्नान की क्या आवश्यकता है।) तथापि मैं आपके लिए यह स्नान की व्यवस्था करता हूँ।

॥अभिषेक॥

सहस्त्रं वा शतं वापि यथाशक्त्यादरेण च। गन्धपुष्पादिकैरीश मुनना चामिपिंञ्चये॥ भावार्थ-भगवन् मैं आदरपूर्वक यथाशक्ति गन्ध-पुष्प आदि से तथा मंत्रो द्वारा सहस्र आपका अभिषेक करता हूँ। उसे स्वीकार करें।

॥वस्त्र॥

मायाचित्रपटच्छ ततिगुह्योरु तेजसे। निवारणविज्ञान वासस्ते कल्पयाम्हम्॥ भावार्थ-भगवन् आप तो निरावृत विज्ञान स्वरूप परमेश्वर हैं। आपने मान विचित्र रूप पट के द्वारा अपने महान तेज को छिपा रखा है। मैं आपको क्या सकता हूँ ? परन्तु फिर भी लोकलाज हेतु आपको यह वस्त्र अर्पण करता हूँ।

॥उत्तरीय॥

ययाश्रित्य महामाया जगत्सम्मोहिनी सदा। तस्मै ते परमेशाय कल्पयाम्तुरारी यकम्॥ भावार्थ-भगवन् आपके आश्रित रहकर भगवती महामाया सदा सम्पूर्ण जगत को मोहित करती रहती है। उन्हीं आप परमेश्वर को मैं उत्तरीय अर्पण करता हूँ।

॥यज्ञोपवीत॥

यस्य शक्तिवेणेदं सम्प्रीतमाखिलम् जगत। यज्ञसूत्राय तस्मै ते यज्ञसूत्रं प्रकल्पये॥ भावार्थ-भगवन् आपकी त्रिविध शक्तियों से यह सम्पूर्ण जगत सदा तृप्त रहता है। जो स्वयं ही यज्ञ सूत्र रुप है। उन्हीं आप प्रभु को मैं यज्ञ सूत्र अर्पण करता हूँ।

॥भूषण॥

स्वभाव सुन्दराङ्गाय नानाशक्ताश्रयाय ते। भूषणानि विचित्रामि कल्पयाम्यमरार्चित॥ भावार्थ-भगवन् आप तो देवपूजित हैं। आपके श्रीअंग स्वभाव से ही परम सुन्दर है। आप नाना शक्तियों को आश्रय देने वाले हैं। फिर भी यह विचित्र आभूषण आपको अर्पण करता हूँ।

॥गन्ध॥

परमानन्द सौरभ्य परिपूर्णदिगन्तम्। गृहाम परमं गन्धं कृपया परमेश्वर ।। भावार्थ-भगवन् आपने ने तो अपनी परमानन्दमयी सुगन्ध से सम्पूर्ण जग को भर रखा है। उसी में से कुछ हिस्सा आपको अर्पण करता हूँ। कृप्या स्वीकार करें।

॥पुष्प ॥

तरीयवन सम्भूतं नानागुणमनोहरम्। अमन्दसौरभं पुष्प गृह्यतामिदमुत्तमम्॥ भावार्थ-भगवन् तीनों अवस्थाओं से परे तुरीयरूपी वन में प्रकट हुए। इस उत्तम दिव्य पुष्प को ग्रहण कीजिये। यह सर्वगुण सम्पन्न है। इसका सुगन्ध कभी कम नहीं होता।

 ॥धूप॥

वनस्पतिरसं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। आनेयं देवदेवेश धूपं भक्त्या गृहाण में॥ भावार्थ-भगवन् यह सूंघने योग्य धूप भक्तिपूर्वक आपकी सेवा में अर्पित करता हूँ। कृप्या इसे ग्रहण करें। यह परम सुगन्धि वनस्पतियों के रस द्वारा तैयार किया गया है।

॥दीप॥

सुप्रकाशं महादीपं सर्वदा तिमिरा पहम। घृतवर्ति समायुक्तं गृहाण मम सत्कृतम्॥ भावार्थ-भगवान यह गाय के घी से युक्त महान दीप सत्कार पूर्वक आपकी सेवा में समर्पित है। यह अंधकार को सदैव दूर करने वाला है। इसे भी आप स्वीकार करें।

॥ नैवेद्य॥

अन्नं चतुर्विधं स्वादु रसैः षड्भिः समन्वितम्। भक्त्या गृहाण में देव नैवेद्यं तुष्टिदं सदा॥ भावार्थ-भगवन् यह छ: रसों से संयुक्त चार प्रकार का स्वादिष्ट अन्न भक्तिपूर्वक आपको समर्पित कर रहा हूँ। कृप्या इसे भी ग्रहण करें।

॥ताम्बूलम्॥

नागवल्लीदलं श्रेष्ठं पूगखादिरचूर्णयुक्। कर्पूरादि सुगन्धाढ्यां यत् तद् गृहाण में॥ भावार्थ-भगवन् यह उत्तम पान सुपारी कत्था और अनेक प्रकार के सुगन्धित वस्तुओं से तैयार किया गया है। प्रभो इसे भी ग्रहण कीजिये।

॥प्रार्थना॥

अभिष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल।भक्त्या समर्पये तुभ्यम मुकावरांचनम्॥ भावार्थ-शरणागतवत्सल। मुझे अभीष्ट सिद्धि प्रदान कीजिये। मैं आपकी भक्ति पूर्वक अमुक आवरण की पूजा समर्पित करता हूँ। ऐसा कहकर पुष्पांजलि भगवन के मस्तक पर छोड़ दें। (अमुक की जगह जिस कामना से पूजा प्रार्थना की गई हो उसका स्मरण/उच्चारण करें) (फिर होम हवन क्रिया करें)

॥हवन के बाद।

भो भो वहे महाशक्ते सर्वकर्म प्रसाधक। कर्मात्तरेऽपि सम्प्रोत सनिध्यं कुरु सादरम्॥ भावार्थ-हे अग्निदेव। आपकी शक्ति बहुत बड़ी है। आप सम्पूर्ण कार्यों को सिद्ध करने वाले हैं। कोई दूसरा कार्य होने पर आपको सादर आना पड़ेगा। इस प्रकार अग्नि विर्सजन करें।

तदन्तर बलि अर्पण करें

ये रौद्रा रौद्र कर्माणो रौद्रस्थान निवासिनः। योगिन्यो ह्यग्ररुपाश्च गणानामधिपाश्च ये॥ विघ्न भूतास्तुथा चान्ये दिग्विदिक्षु समाश्रितः।सर्वे ते प्रीतमनसः प्रतिगृह्णन्वितं बलिम्॥ भावार्थ-जो भयंकर है। जिनके कर्म भयंकर है। जो भयंकर स्थानों में निवास करते हैं। जो उग्र रूपवाली योगिनियां, जो गणों के स्वामी तथा विघ्न स्वरूप है तथा सम्पूर्ण दिशाओं में स्थित हैं। वे सब प्रसन्नचित्त होकर यह बलि ग्रहम करें। । कृप्या बलि में (गन्ध पुष्प अक्षत) की ही बलि अर्पण करें।

क्षमा प्रार्थना

अज्ञानाद्वा प्रमाद्वा वैकल्यात् साधनस्य च। यल्यूनमतिरिक्तं वा तत्सर्व क्षन्तुमर्हसि॥ द्रव्यहीनं क्रियाहीनं मंत्रहीनं मयान्यथा। कृतं यत्तत क्षमस्वेश कृपया त्वं दयानिधे॥ भावार्थ-भगवन्! अज्ञान से प्रमाद से तथा साधन की कमी से मेरे द्वारा जो न्यनता या अधिकता का दोष बन गया हो। उसे आप क्षमा कर दें। प्रभो मेरे द्वारा जो द्रव्यहीन, मन्त्रहीन, क्रियाहीन विधिविपरीत कर्म हो गया हो उसे आप क्षमा कर दें। मेरे द्वारा किया गया कर्म आपकी पूजा रूप हो जाये।

॥विसर्जन मंत्र॥(Narsingh Puja)

गच्छ गच्छ परं स्थानं जगदीश जगन्मय। यत्र ब्रह्मादयो देवा जानति च सदाशिवः॥ भावार्थ-भगवन, जगदीश्वर आप अब अपने उस स्थान को पधारिये जिनका ज्ञान ब्रह्मा, शिव आदि देवों को भी नहीं है।

 

Narasimha Jayanti 2021 पर Narsingh  Bhagwan Puja

नरसिंह जयंती का दिन भगवान विष्णु के भक्तो के लिए अत्यधिक शुभ माना जाता है। इस दिन नरसिंह भगवान(Narsingh Bhagwan) के भक्त उपवास रखते हैं। Narasimha Jayanti 2021 या नरसिंह चतुर्दशी का एक महत्वपूर्ण त्योहार शुक्ल पक्ष की वैशाख चतुर्दशी (14 वें दिन) को मनाया जाता है

श्री नरसिंह पुराण

 

 

 

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